गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की राज एम्पायर सोसायटी में रहने वाले हरीश राणा का नाम इन दिनों देशभर में चर्चा में है। उनका परिवार आध्यात्मिकता और धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। हरीश के घर में हर ओर प्रजापिता ब्रह्माकुमारी से जुड़े चित्र और पूजा-साधना का माहौल दिखाई देता है। उनके पिता अशोक राणा सुबह और शाम नियमित ध्यान और पूजा करते हैं। उनका जीवन न केवल आध्यात्मिक है, बल्कि सामाजिक रूप से भी सक्रिय है।
पिता अशोक राणा: आध्यात्मिकता और समाज सेवा का संगम
अशोक राणा पेशे से कुशल शेफ हैं। उन्होंने पहले एक पांच सितारा होटल में काम किया, लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद परिवार के लिए सैंडविच बनाने का व्यवसाय शुरू किया। वे स्थानीय लोगों में बहुत मिलनसार और उदार स्वभाव के लिए जाने जाते हैं। सोसायटी के लोग बताते हैं कि अशोक राणा अक्सर अपने हाथ से बने सैंडविच दूसरों को खिलाते रहते हैं। इसके अलावा, वे प्रतिदिन गोमाता को भोजन कराते हैं और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं।
हरीश राणा का दुखद जीवन और शारीरिक अक्षमता
हरीश ने जुलाई 2010 में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया। अगस्त 2013 में रक्षाबंधन के दिन एक हादसे के दौरान वह पीजीआई चंडीगढ़ की चौथी मंजिल से गिर गए। गंभीर रूप से घायल हरीश को तत्काल पीजीआई में भर्ती कराया गया। बाद में दिसंबर 2013 में उन्हें दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में लाया गया, जहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित हैं। इस हादसे के बाद उनके हाथ-पैर निष्क्रिय हो गए और वह जीवन भर बिस्तर पर रहने को मजबूर हो गए।
सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी और इच्छामृत्यु की प्रक्रिया
हरीश राणा की कठिन परिस्थितियों और असहनीय दर्द को देखते हुए उनके माता-पिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में इच्छामृत्यु की अपील की, जिसे 8 जुलाई 2025 को खारिज कर दिया गया। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। करीब आठ महीने की कानूनी प्रक्रिया के बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को पैसिव इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी।
एम्स में इलाज और अंगदान की तैयारी
दिल्ली स्थित एम्स में हरीश राणा को भर्ती कराया गया। यहां एक विशेष मेडिकल टीम उनके लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की प्रक्रिया में लगी है। पैलिएटिव विशेषज्ञों के अनुसार, पैलिएटिव केयर में मरीज की मौत को तेज नहीं किया जाता, बल्कि दर्द और तकलीफ को कम करके प्राकृतिक मृत्यु की अनुमति दी जाती है। इसके साथ ही हरीश के अंगदान पर भी ध्यान दिया जा रहा है। परिवार की इच्छा के अनुसार, एम्स की मेडिकल टीम हरीश के अंगों की पूरी जांच कर रही है ताकि अंगदान के लिए कौन से अंग सही हैं, यह निर्धारित किया जा सके।
परिवार की जड़ें और स्थानीय संवेदना
हरीश राणा का परिवार हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले से जुड़ा हुआ है। उनकी जड़ें जयसिंहपुर उपमंडल की पंचायत सरी के प्लेटा गांव में हैं। स्थानीय निवासी और पंचायत सरी की निवर्तमान प्रधान रीमा कुमारी ने बताया कि परिवार के प्रति सभी की गहरी संवेदना है और यह अत्यंत पीड़ादायक स्थिति है। हालांकि अशोक राणा और उनका परिवार रोजगार और अन्य कारणों से प्रदेश से बाहर बस गए, लेकिन समय-समय पर अपने पैतृक गांव आते रहते हैं।
निष्कर्ष
हरीश राणा का मामला न केवल देशभर में इच्छामृत्यु और पैलिएटिव केयर पर बहस का केंद्र बना है, बल्कि यह परिवार की अडिग आस्था, सामाजिक जुड़ाव और मानवीय संवेदना को भी उजागर करता है। इस प्रक्रिया में मेडिकल टीम की वैज्ञानिक दृष्टि, परिवार की संवेदनशीलता और न्यायिक हस्तक्षेप ने एक जटिल और भावनात्मक मुद्दे को व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाया है।

