उत्तराखंड के कई शहरों और कस्बों में इन दिनों रसोई गैस की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति में कमी का सीधा असर आम लोगों और खासतौर पर छोटे दुकानदारों पर देखने को मिल रहा है। चाय, समोसे और बिरियानी जैसे रोजमर्रा के खाद्य पदार्थ अब पहले से महंगे हो गए हैं, जिससे आम उपभोक्ता की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
बढ़ती लागत ने बढ़ाए दाम
गैस सिलिंडर महंगा होने और समय पर उपलब्ध न होने के कारण छोटे चाय-नाश्ते के दुकानदारों की लागत बढ़ गई है। इसका असर सीधे ग्राहकों पर पड़ा है। जहां पहले 10 रुपये में मिलने वाली चाय अब 15 रुपये में बिक रही है, वहीं समोसे की कीमत 15 रुपये से बढ़कर 18 रुपये तक पहुंच गई है। इसी तरह बिरियानी के दामों में भी इजाफा हुआ है—हाफ प्लेट जो पहले 30 रुपये की थी, अब 40 रुपये में मिल रही है, जबकि फुल प्लेट 50 से बढ़कर 60 रुपये हो गई है।
गैस छोड़ पारंपरिक ईंधन की ओर रुख
गैस की किल्लत से परेशान कई छोटे दुकानदार अब पुराने तरीकों की ओर लौटने को मजबूर हो गए हैं। कई विक्रेता अब घर पर लकड़ी और कोयले का इस्तेमाल करके खाना तैयार कर रहे हैं और उसे दुकान पर लाकर गर्म करके बेच रहे हैं। इससे उनकी लागत कुछ हद तक कम हो रही है, लेकिन काम करने का तरीका अधिक मेहनत वाला हो गया है।
छोटे दुकानदारों के लिए बढ़ी मुश्किलें
स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि बड़े होटल और कैफे तो गैस सिलिंडर का स्टॉक पहले से जमा कर लेते हैं, लेकिन छोटे दुकानदारों के पास इतनी आर्थिक क्षमता या भंडारण की सुविधा नहीं होती। यही कारण है कि संकट का सबसे ज्यादा असर इन्हीं पर पड़ रहा है।
कुछ ठेले और टपरी संचालकों ने बताया कि गैस की लगातार कमी और बढ़ती कीमतों के कारण उनका काम चलाना मुश्किल होता जा रहा है। कई लोगों को तो अस्थायी रूप से अपनी दुकानें बंद करने तक की नौबत आ गई है।
आम जनता पर दोहरी मार
एक तरफ दुकानदारों की लागत बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ ग्राहकों को भी महंगाई का सामना करना पड़ रहा है। रोजमर्रा की छोटी-छोटी चीजें महंगी होने से आम आदमी का बजट बिगड़ रहा है।
समाधान की उम्मीद
स्थानीय लोगों और व्यापारियों का कहना है कि अगर जल्द ही गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं हुई और कीमतों पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो यह समस्या और गंभीर हो सकती है। छोटे व्यापारियों के लिए राहत उपाय और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित करना समय की मांग बन गई है।

