उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और देश की आधुनिक सड़क संरचना के प्रमुख शिल्पकार माने जाने वाले मेजर जनरल बी.सी. खंडूड़ी के निधन से पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई है। राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने उनके निधन को उत्तराखंड और देश की राजनीति के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। अपने सादगीपूर्ण जीवन, ईमानदार छवि और कठोर प्रशासनिक फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले जनरल खंडूड़ी ने राजनीति में सुशासन की नई मिसाल पेश की थी।
आधुनिक भारत की सड़क क्रांति के वास्तुकार
मेजर जनरल बी.सी. खंडूड़ी को देश की आधुनिक सड़क व्यवस्था का प्रमुख निर्माता माना जाता है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वर्ष 2000 से 2004 तक केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री के रूप में उन्होंने कई ऐतिहासिक योजनाओं को धरातल पर उतारा। उनके नेतृत्व में स्वर्ण चतुर्भुज परियोजना को गति मिली, जिसके तहत दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों को आधुनिक हाईवे नेटवर्क से जोड़ा गया। खंडूड़ी ने इस महत्वाकांक्षी परियोजना को तय समय सीमा के भीतर पूरा करने पर विशेष जोर दिया। उनके सैन्य अनुशासन और कार्यशैली का असर मंत्रालय के कामकाज में साफ दिखाई देता था। इसके अलावा प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना को प्रभावी तरीके से लागू कर ग्रामीण भारत को सड़कों से जोड़ने में भी उनकी अहम भूमिका रही। पहाड़ी राज्यों, विशेषकर उत्तराखंड में सड़क संपर्क सुधारने के लिए उनके प्रयासों को आज भी याद किया जाता है।
उत्तराखंड में सुशासन की मिसाल
बी.सी. खंडूड़ी ने उत्तराखंड में दो बार मुख्यमंत्री पद संभाला। पहली बार वे 8 मार्च 2007 से 27 जून 2009 तक मुख्यमंत्री रहे, जबकि दूसरी बार 11 सितंबर 2011 को उन्होंने राज्य की कमान संभाली। उनका कार्यकाल प्रशासनिक पारदर्शिता, अनुशासन और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रवैये के लिए जाना जाता है। वर्ष 2011 में जब देशभर में अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन अपने चरम पर था, तब जनरल खंडूड़ी ने उत्तराखंड में देश के सबसे सख्त लोकायुक्त बिलों में से एक पेश किया। इस बिल की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें मुख्यमंत्री को भी जांच के दायरे में रखा गया था। उस समय उनके इस फैसले की देशभर में चर्चा हुई थी। इसके अलावा उन्होंने सरकारी सेवाओं को समयबद्ध तरीके से जनता तक पहुंचाने के लिए कानून लागू किया, ताकि आम लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न लगाने पड़ें। तबादला नीति को पारदर्शी बनाकर उन्होंने सिफारिश और दबाव की राजनीति पर भी रोक लगाने की कोशिश की। उनकी कार्यशैली का मूल मंत्र था— “काम नहीं तो वेतन नहीं।”
‘खंडूड़ी है जरूरी’ बना था चुनावी नारा
वर्ष 2011 में भाजपा की छवि पर कई विवादों का असर पड़ रहा था। ऐसे समय में पार्टी आलाकमान ने दोबारा बी.सी. खंडूड़ी को मुख्यमंत्री बनाकर जनता के बीच भरोसा कायम करने की कोशिश की। उनकी साफ-सुथरी छवि और प्रशासनिक क्षमता को देखते हुए भाजपा ने “खंडूड़ी है जरूरी” का नारा दिया, जो पूरे उत्तराखंड में बेहद लोकप्रिय हुआ। उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2012 विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि खुद बी.सी. खंडूड़ी को कोटद्वार सीट से बेहद मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा। उनकी हार को उस समय उत्तराखंड राजनीति का सबसे बड़ा उलटफेर माना गया था।
ईमानदार राजनीति की पहचान थे खंडूड़ी
मेजर जनरल बी.सी. खंडूड़ी को उत्तराखंड की राजनीति में ईमानदारी, सादगी और सख्त प्रशासन के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सेना से राजनीति तक का उनका सफर अनुशासन और राष्ट्रसेवा की मिसाल रहा। उनके निधन से उत्तराखंड ने एक ऐसे नेता को खो दिया है जिसने राजनीति को सेवा और जवाबदेही का माध्यम बनाया। प्रदेशभर में लोग उन्हें एक ऐसे जननेता के रूप में याद कर रहे हैं जिन्होंने विकास, सुशासन और पारदर्शिता को अपनी राजनीति का आधार बनाया।

